कश्मीर में वह दौर अब बीत चुका है जब अलगाववाद की आग भड़काई जाती थी और भारत के खिलाफ साजिशें रची जाती थीं। देश के गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में इस परिवर्तन की पुष्टि करते हुए कहा कि अब कश्मीर शांति और विकास की नई राह पर आगे बढ़ रहा है। जिन संगठनों ने कभी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के बैनर तले भारत विरोधी एजेंडा चलाया था, वे अब खुद मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं।
हुर्रियत से अलगाव, भारत के साथ नई शुरुआत
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख घटक रहे जेएंडके तहरीकी इस्तेकलाल और जेएंडके तहरीक-ए-इस्तिकामत ने मार्च 2025 में औपचारिक रूप से अलगाववाद और हिंसा का रास्ता छोड़ दिया। इन संगठनों ने घोषणा की कि वे अब भारत की अखंडता और शांति के पक्षधर हैं। अमित शाह ने इसे “कश्मीर में शांति की नई सुबह” करार दिया। दशकों तक अलगाववाद को हवा देने वाली हुर्रियत आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
जमात-ए-इस्लामी की बदली सोच
कभी कश्मीर में अलगाववादी विचारधारा और आतंकवाद को समर्थन देने के लिए कुख्यात जमात-ए-इस्लामी पर फरवरी 2019 में केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगाया। इसके बाद संगठन में दरारें पड़ने लगीं। धीरे-धीरे कई नेता और कार्यकर्ता हिंसा से तौबा कर मुख्यधारा में लौट आए। हालांकि जमात-ए-इस्लामी ने सामूहिक रूप से यह निर्णय नहीं लिया, लेकिन इसके कई पूर्व सदस्य अब राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं।
JKLF का कमजोर होता प्रभाव
1980-90 के दशक में अलगाववाद और आतंक का बड़ा चेहरा रहा जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) पहले ही 1994 में हिंसा से पीछे हट चुका था। इसके बाद, यासीन मलिक पर आतंकवाद से जुड़े गंभीर आरोप लगे और अब वह जेल में बंद हैं। इन घटनाओं के चलते JKLF पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है और घाटी में इसका कोई प्रभाव नहीं बचा।
हिजबुल मुजाहिदीन की टूटती कमर
कभी कश्मीर के सबसे बड़े आतंकी संगठनों में से एक हिजबुल मुजाहिदीन अब कमजोर हो चुका है। 2020-21 के दौरान इस संगठन के दर्जनों आतंकियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की। जुलाई 2020 से शुरू हुई आत्मसमर्पण नीति के तहत 50 से अधिक आतंकियों ने हथियार डाल दिए। हालांकि, यह संगठन अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन इसकी शक्ति बिखर चुकी है।
आतंकवाद पर कड़ा प्रहार: गिरती संख्या
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2015 से 2024 के बीच ‘ऑपरेशन ऑल आउट’ के तहत 1,607 आतंकियों का सफाया किया गया। 2020 में सबसे अधिक 221 आतंकी मारे गए, जबकि 2024 में यह संख्या घटकर लगभग 75 रह गई। यह गिरावट सुरक्षा बलों की सख्त नीति और LOC (लाइन ऑफ कंट्रोल) पर मजबूत निगरानी का परिणाम है।
वर्षवार आतंकवादियों का सफाया
| वर्ष | मारे गए आतंकी |
|---|---|
| 2015 | 108 |
| 2016 | 150 |
| 2017 | 213 |
| 2018 | 257 |
| 2019 | 154 |
| 2020 | 221 |
| 2021 | 182 |
| 2022 | 172 |
| 2023 | 75 |
| 2024 | 75 (लगभग) |
बदलाव की प्रमुख वजहें
इस सकारात्मक बदलाव के पीछे केंद्र सरकार की सख्त आतंकवाद विरोधी नीति, अनुच्छेद 370 का हटना, युवाओं में बढ़ती जागरूकता और रोजगार के अवसरों में वृद्धि मुख्य कारण रहे हैं। घाटी में विकास परियोजनाओं के चलते स्थानीय युवा अब आतंक की राह छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर जोर देते हुए कहा, “जो संगठन कभी भारत के खिलाफ साजिश रचते थे, वे अब समझ चुके हैं कि बंदूक से कुछ हासिल नहीं होगा।” हालांकि, कुछ संगठन अभी भी पूरी तरह हथियार डालने को तैयार नहीं हैं, लेकिन सुरक्षा बलों का कहना है कि उनका अंत भी अब निकट है।

