मुंबई, जिसे भारतीय सिनेमा का दिल कहा जाता है, ने कई प्रतिष्ठित स्टूडियो और महान फिल्मकारों को जन्म दिया है। इन्हीं में से एक नाम जो सिनेमा प्रेमियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगा, वह है राज कपूर का आर. के. स्टूडियो। यह सिर्फ एक फिल्म निर्माण स्थल नहीं था, बल्कि भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग का एक चमकता प्रतीक भी था। इसकी स्थापना से लेकर इसके अंत तक की कहानी बेहद भावनात्मक और प्रेरणादायक रही है।
आर. के. स्टूडियो की स्थापना
राज कपूर, जिन्हें भारतीय सिनेमा का ‘शोमैन’ कहा जाता है, ने 1948 में मुंबई के चेंबूर इलाके में आर. के. स्टूडियो की स्थापना की। यह स्टूडियो उन्होंने अपनी पहली फिल्म “आग” (1948) के निर्माण के दौरान बनाया था। उनका सपना था कि यह स्टूडियो भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े स्टूडियो में से एक बने, जहां फिल्म निर्माण की सभी आधुनिक सुविधाएँ मौजूद हों।

राज कपूर का यह सपना सच हुआ, और जल्द ही आर. के. स्टूडियो बॉलीवुड के सबसे व्यस्त और मशहूर स्टूडियो में से एक बन गया।
गोल्डन एरा: जब स्टूडियो था सपनों की फैक्ट्री
1950 और 1960 का दशक आर. के. स्टूडियो के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। इस दौरान राज कपूर ने कई क्लासिक बॉलीवुड फिल्में बनाईं, जो न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराही गईं।
प्रमुख फिल्में:
- आवारा (1951): इस फिल्म का गाना “आवारा हूँ” आज भी लोकप्रिय है। यह फिल्म सोवियत संघ सहित कई देशों में हिट रही।
- श्री 420 (1955): फिल्म का गाना “मेरा जूता है जापानी” भारत की पहचान बन गया।
- संगम (1964): यह राज कपूर की पहली रंगीन फिल्म थी और बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही।
- मेरा नाम जोकर (1970): भले ही यह फिल्म उस समय फ्लॉप रही, लेकिन बाद में इसे राज कपूर की सबसे बेहतरीन फिल्मों में गिना जाने लगा।
आर. के. स्टूडियो की पहचान
आर. के. स्टूडियो का एक अनोखा प्रतीक था – एक आदमी जो वायलिन बजा रहा है, जो फिल्म “बरसात” (1949) के एक प्रसिद्ध दृश्य से प्रेरित था। यह लोगो आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर है।
स्टूडियो में भव्य फिल्म सेट, अत्याधुनिक तकनीकी सुविधाएँ, और शानदार शूटिंग लोकेशंस थीं, जो बॉलीवुड के लिए वरदान साबित हुईं। यहाँ सिर्फ आर. के. फिल्म्स की ही नहीं, बल्कि अन्य फिल्म निर्माताओं की फिल्मों की शूटिंग भी की जाती थी।
धीरे-धीरे ढलान की ओर
1970 के दशक के बाद राज कपूर ने निर्देशन पर अधिक ध्यान देना शुरू किया और स्टूडियो में बनी फिल्मों की संख्या में कमी आने लगी।
हालांकि, उन्होंने “बॉबी” (1973) और “सत्यम शिवम सुंदरम” (1978) जैसी बॉलीवुड ब्लॉकबस्टर दीं, लेकिन 1980 के दशक में स्थिति धीरे-धीरे बदलने लगी। राज कपूर के निधन (1988) के बाद, उनके बेटों ने स्टूडियो को संभालने की कोशिश की, लेकिन बदलते दौर और तकनीक के कारण स्टूडियो की चमक फीकी पड़ने लगी।
1990 और 2000 के दशक में स्टूडियो का उपयोग मुख्य रूप से टीवी शो और विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग के लिए किया जाने लगा। नई प्रोडक्शन कंपनियों ने आधुनिक स्टूडियो बनाए, जिससे आर. के. स्टूडियो का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा।
2017 की आग: आर. के. स्टूडियो के अंत की शुरुआत
2017 में गणेश चतुर्थी के दौरान आर. के. स्टूडियो में भीषण आग लग गई। इस आग में स्टूडियो में रखी राज कपूर की ऐतिहासिक फिल्मों की पोशाकें, कैमरे, और कई महत्वपूर्ण सेट जलकर राख हो गए।
इसके बाद रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, और कपूर परिवार ने स्टूडियो को फिर से बनाने पर विचार किया, लेकिन अंततः इसे बेचने का निर्णय लिया। यह खबर सिनेमा प्रेमियों के लिए बेहद भावनात्मक थी, क्योंकि आर. के. स्टूडियो सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की विरासत का हिस्सा था।

