दिल्ली: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय लिखा, जिसने दलितों, पिछड़ों और वंचित समुदायों को आवाज दी। कांशीराम के नेतृत्व में साल 1984 में शुरू हुई यह यात्रा उम्मीदों से भरी थी। लेकिन आज, जब हम इस पार्टी के मौजूदा हालात को देखते हैं, तो मन में कई सवाल उठते हैं– क्या यह पार्टी अपने स्वर्णिम दिनों की ओर लौट सकेगी?
बसपा का उत्थान: संघर्ष से शिखर तक
साल 1984 में जब कांशीराम ने बसपा की नींव रखी, तो यह एक नए सपने की शुरुआत थी। उनका उद्देश्य साफ था – समाज के उन वर्गों को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाना, जिन्हें अब तक हाशिए पर रखा गया था।

शुरुआती कदम:
साल 1989 में बसपा ने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और दो सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह छोटा कदम भविष्य की बड़ी उम्मीदें लेकर आया।
1995 का ऐतिहासिक साल:
मायावती ने उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच दिया। उनके नेतृत्व में बसपा ने वह कर दिखाया, जिसकी पहले कल्पना भी मुश्किल थी।
2007 का चमत्कार: “सामाजिक इंजीनियरिंग” की ताकत
साल 2007 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। मायावती की “सामाजिक इंजीनियरिंग” – दलित और ब्राह्मण वोटों को जोड़ने की रणनीति – ने पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाया। यह दिखाता है कि राजनीति में सही रणनीति कैसे असंभव को संभव बना सकती है।
बसपा सरकार का प्रभाव और विवाद:
बसपा सरकार ने उत्तर प्रदेश में कई बड़े बदलाव किए।
विकास कार्य:
मायावती सरकार ने सड़कों, फ्लाईओवर और स्मारकों के निर्माण पर जोर दिया। अंबेडकर स्मारक और कांशीराम स्मारक जैसे भव्य प्रोजेक्ट बसपा शासनकाल की पहचान बने।

आलोचनाएं:
लेकिन हर सफलता के साथ विवाद भी जुड़े। मायावती पर स्मारकों और मूर्तियों पर ज्यादा पैसा खर्च करने के आरोप लगे। कुछ ने इसे जनहित से भटकाव बताया, तो कुछ ने इसे दलित स्वाभिमान की लड़ाई कहा।
सशक्तिकरण की पहल:
सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण को सख्ती से लागू किया गया।
दलितों और पिछड़ों को मुख्यधारा में लाने की कोशिशें की गईं।
गिरावट की ओर: वर्तमान चुनौतियां
बसपा का वर्तमान प्रदर्शन इसकी पुरानी छवि से बिल्कुल उलट है, साल 2014 और साल 2019 लोकसभा चुनाव: पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, साल 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा केवल 1 सीट तक सीमित रह गई।
आंतरिक कमजोरियां:
पार्टी गुटबाजी और नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। मायावती के बाद नेतृत्व किसके हाथ में होगा, यह आज भी सवाल बना हुआ है।
भविष्य की राह:
जातिवाद की छवि से बाहर निकलना पार्टी के लिए जरूरी है। विकास, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर फोकस करना होगा। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का प्रभावी उपयोग पार्टी को नई पहचान दिला सकता है।
बसपा के प्रदर्शन का आंकलन
विधानसभा चुनाव:
- साल 2007: 30.43% वोट शेयर, 206 सीटें
- साल 2012: 25.95% वोट शेयर, 80 सीटें
- साल 2017: 22.23% वोट शेयर, 19 सीटें
- साल 2022: 12.88% वोट शेयर, 1 सीट

लोकसभा चुनाव:
- साल 2009: 21 सीटें
- साल 2014: 00 सीटें
- साल 2019: 10 सीटें (सपा-बसपा गठबंधन)
- साल 2024: 00 सीटें
क्या बसपा वापसी कर सकती है?
बसपा ने भारतीय राजनीति में वंचित वर्गों को ताकत और आवाज दी। लेकिन, आज पार्टी अपनी पहचान और जनाधार को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। भ्रष्टाचार, गुटबाजी और जातिवादी राजनीति जैसे मुद्दों ने इसे कमजोर किया है।
अब समय है कि बसपा नई रणनीतियों के साथ आगे बढ़े। मायावती के बाद युवा नेतृत्व, समावेशी राजनीति और डिजिटल माध्यमों का बेहतर उपयोग ही पार्टी को नया जीवन दे सकता है।

