क्या इंसान लालच में इतना अंधा हो सकता है कि वह दरिंदगी की सारी हदें पार कर दे? सुलतानपुर में जो हुआ, उसने न सिर्फ इंसानियत को शर्मसार किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि कुछ लोगों के लिए कानून और पुलिस का डर नाममात्र का रह गया है।

शादी, लालच और शुरू हुआ अत्याचार

पीड़िता की शादी 21 मई 2021 को शुभम मिश्रा से हुई। पिता ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर एक लाख रुपये नकद और डेढ़ लाख की बाइक दहेज में दी, लेकिन इस भूखे परिवार की इच्छाएँ यहीं नहीं थमीं। शादी के सिर्फ एक महीने बाद ही शुभम मिश्रा ने शराब के नशे में मारपीट और गाली-गलौज शुरू कर दी। जल्द ही परिवार ने पाँच लाख रुपये और लाने की मांग रख दी। ससुर राजेश मिश्रा, सास सुशीला देवी और चचिया ससुर बृजेश मिश्रा ने भी इस अमानवीय मांग का समर्थन किया।

हैवानियत की हदें पार

यह उत्पीड़न सिर्फ यहीं नहीं रुका- पति ने पीड़िता का अश्लील वीडियो बना लिया और उसे ब्लैकमेल करने लगा। हद तो तब हुई जब एक दिन नशीला पदार्थ पिलाकर उसके शरीर में नशे का इंजेक्शन लगा दिया। जब पीड़िता होश में आई तो उसका हाथ कटा हुआ था। इस हैवानियत के बाद भी दरिंदा पति शांत नहीं बैठा-उसने वीडियो इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल कर दीं।

अधमरी हालत में बाईपास पर फेंका

4 जनवरी को पति और उसके परिवारवालों ने बेरहमी से पीड़िता को पीटा और अधमरी हालत में बाईपास पर फेंक दिया। किसी तरह जान बचाकर वह अपने मायके पहुंची। अब वह जिंदगी और मौत से लड़ते हुए न्याय की गुहार लगा रही है। पीड़िता का साफ कहना है—”मुझे आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा है।”

सवाल जो हर किसी को झकझोर देंगे:

  • इस हैवानियत को अंजाम देने वालों को ऐसी मानसिकता किसने दी? क्या समाज का हिस्सा होने के बावजूद हमारे बीच ऐसे राक्षस फल-फूल रहे हैं?
  • सुलतानपुर पुलिस अब तक क्या कर रही है? क्या फिर से सिर्फ कागजी कार्रवाई कर मामले को रफा-दफा किया जाएगा?
  • बेटी का कटा हुआ हाथ, वायरल वीडियो और बाईपास पर अधमरी हालत में फेंका जाना—क्या ये सबूत पुलिस को कार्रवाई के लिए काफी नहीं? या किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार किया जा रहा है?

समाज और प्रशासन के लिए कड़ा संदेश

यह सिर्फ एक दहेज उत्पीड़न का मामला नहीं है, यह समाज के सामने खड़ी एक भयावह सच्चाई है। आज सवाल सिर्फ न्याय का नहीं है, बल्कि सिस्टम और समाज की संवेदनहीनता का भी है। आखिर कब तक बेटियाँ इस तरह दरिंदगी का शिकार होती रहेंगी? कब तक पुलिस और कानून मूकदर्शक बने रहेंगे? क्या बेटी बचाओ सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है?

अब समय है कि प्रशासन जागे और दोषियों को ऐसी सजा मिले जो भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोक सके। नहीं तो हम बस ऐसे ही खबरें पढ़ते रहेंगे और बेटियाँ इंसाफ की भीख मांगती रहेंगी।